करन भगत यूँ तो हमेशा से ही काफी संयम वाले व्यक्ति रहे हैं परन्तु किसी के ऊपर ज्यादती उनसे कत्तई बर्दाश्त नहीं होती थी,और न चाहते हुए भी भी वो दूसरों के पचड़ों में पड़ जाते थे और जाब बात अपने पर ही हो तब तो उनका अलग दैवीय रूप देखने को मिलता था / पर मजेदार बात यह थी कि वो कोई दारा सिंह नहीं थे इसके विपरीत बहुत ही दुबले थे हालाँकि ऐसा नहीं है कि इसके बाबत उन्होंने कोई प्रयास न किया हो पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात ही रहा है/ बल्कि लोग तो कहते थे कि एक समय वो अखारों में जाया करते थे और वहां पर व्यायाम शाला में अनगिनत दंड बैठक लगते थे कुछ लोग तो उन पर हँसते भी तठे पर इसकी उन्हें कोई परवाह न थी/ एक बार ऐसे ही वो बजरंग अखारे के व्यायामशाला में दंड बैठक में मशगूल थे, उसी वक्त गावं के मुखिया जी का बेटा हीरल नारंगी अया पहुंचा/ उसे गावं का सबसे बड़ा बदमाश कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और दूसरों कि टांग खीचना उसका बचपन से ही शगल रहा था / भगत जी को व्यायामशाला में कसरत करते देख उससे रहा नहीं गया और उन्हें देखते ही ठहाका मार दिया/ यूँ तो वह भी कोई पहेलवान नहीं था पर १७ साल कि उम्र में भी वह काफी बड़ा दिखता था और शरीर भी औसत था/ भगत जी का कोई अपमान कर दे ये तो उनसे बिलकुल भी नहीं सहा जाने वाला काम था और दोनों के बीच गहमा गहमी शुरू हो गई /आसपास के पहेलवान और आम आदमी जब वहां पर पहुंचे तब बात कुछ हल्काई /जब लोगों को इस झगडे कि जड़ का पता चला तो कानाफूसी शुरू हो गई/ इसी बीच भगत जी ने ऊँची आवाज में एलान करते हुए कहा "अगर इसको अपने पर इतना गुमान है तो मैं इससे दो दो हाथ करने को तैयार हूँ अगर मैं हारा तो तो कभी इस अखारे में नहीं आऊंगा पर अगर मैं जीत गया तो ये छः महीने तक मेरे खाने पीने का खर्च उठाएगा और मेरी सेवा करेगा"/ हालाँकि भगत जी ने इतनी अजीब शर्त रखी थी और उनका पलड़ा भरी भी था पर फिर भी तैश में आकर नारंगी ने कुश्ती के लिए हाँ कह दिया /गावं वालों ने दोनों को बहुत समझाया पर कोई भी कुछ सुनने को तैयार नहीं था अंततः कुश्ती का दिन अगले मंगल को नत्थी किया गया/कुश्ती में दो दिन और शेष थे और भगत जी जोर शोर से तैयारी कर रहे थे वहीँ जब मुखिया को इस बात का पता चला तो वो सोच में पड़ गए बात यूँ थी भगत जी मुखिया जी के बचपन से ही साथ में रहे हैं और वो उनके काफी करीब भी थे और हालाँकि शरीर भले ही भगत जी का कम हो, पर उन्हें लगता था भगत जी तो अखारे पर तो वो जाते ही थे और उन्हें दावँ पेंच तो आते ही होंगे वही नारंगी इसके उलट अगर नारंगी हार गया तो उनकी बहुत फजीहत होगी ये सोच के उनकी चिंता दुगुनी हो गयी और उसके बाद छः महीने कि आवाभगत वाली शर्त ने उनका चैन उड़ा दिया tha/
कुश्ती के एक दिन पहले कि रात में वो भगत जी से मिलने के लिए गए और कहा कि वो अपनी शर्त वापस लेलें पर अब भगत जी कहाँ सुनने वाले थे अंततः वो इस बात पर राजी हुए कि ५००० रूपये नगद और नारंगी खुद आके उनसे माफ़ी मांगे तब वो शर्त वापस ले लेंगे /मुखिया जी को इससे वाजिब कुछ और न लगा ५००० नगदी उन्होंने तुरंत भगत जी को दे दी और नारंगी को डांट डपट कर माफ़ी मांगने को कहा और इस तरह भगत जी कुश्ती लड़े बिना ही जीत गए /ये बात गावं में आग कि तरह फ़ैल गयी सब नारंगी को डरपोक तो कोई मुखिया को ही डरपोक बता रहा था कुछ तो भगत जी के लिए फूल माला का इंतज़ाम में लग गए /अगली सुबह जब भगत जी व्यायाम शाला पहुंचे तो लोगों ने उनका फूलों से सवागत किया और पहलवानों ने उनकी तारीफ़ओं के पुल बांध दिए , इतना मान सम्मान पाकर भगत जी का सीना ख़ुशी से फूले नहीं समां रहा था और उनका इकाह्रह बदन आज पहेले से भी जयादा तेजमान था/
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