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Tuesday, November 15, 2011
समझ
नम्रता बिनोवा एक सहनशील महिला थीं /बचपन से ही माँ के कामो में हाथ बटाती थी /भाइयों और बहनों की जितनी सेवा माँ ने की होगी उतना ही नम्रता ने भी कि थी यदि कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा/एक बार तो माँ बचपन में बीमार पड़ गयी उस समय सारे घर का बोझ नम्रता के सर अया गया /पर नम्रता ने उसे बहुत ही सहजता से उस कठिन समय में माँ और अपने भाई बहनों का ख्याल रख्खा /उनकी खुशियों कि खातिर उसने अपना बचपन बलिदान कर दिया /बहुत कम उम्र में उनका ब्याह श्रीजन महात्मा से हो गया वो भी घर के अग्रज थे और घर कि आर्थिक जिम्मेदारियों का वहन उन पर ही था/हालाँकि नम्रता को यूँ तो किसी ने गुस्सा होते नहीं देखा था और तो और यदि कोई उन पर गुस्सा होता तो वो चुपचाप सुन लेती थीं /उनके दर्द केवल अश्रुओं के माध्यम से तर सागर में मिल जाते थे और बाकि का गुस्सा वो अपने ईश देव को याद करके भूला देती थीं/फागुन का परवान चढ़ा हुआ था और इसके खुमार में गावं भर में एक अलग ही उल्लास दिखाई देता था /नम्रता आज भी अपनी पहली होली याद करती हैं तो उनकी शरीर में इक सिरहन सी दौड़ जाती है /शायद वोहि एक ऐसा दिन था जब उन्होंने पहली बार अपने पतिदेव पर kabhi गुस्सा निकाला था /श्रीजन यूँ तो बहुत भोले थे और किसी कि बात को ना कहने में अक्षम महसूस करते थे /होली के समय, शादी के पहले मदिरा पान पर कई बार उन्होंने आपत्ति जताई थी पर उनके मित्र उन्हें कहाँ छोड़ने वाले थे और शादी कि पहली होली पर वो कोई झंझट नहीं छाहते थे इसलिए इस बाआर उन्होंने थोडा रुक कर होली मानाने कि सोची/ पर कमबख्त मित्र गन मंडली सहित सुबह ही उनके घर आ पहुंचे और उन्हें अपने साथ उठा लिया/दोपहर बाद जब वो घर लौटे तो उनके रंगे पुते बदन par फटे कपड़ों में उनसे दूर से ही मदिरा कि बू आ रही थी / एक तो सुबह से उनकी नम्रता से बात भी नहीं हो पाई थी ,नम्रता ने जब दूर से ही उन्हें देखा तो पहले कुछ खुश हुईं पर वो ख़ुशी क्षद भंगुर मात्र थी/मदिरा कि महक से नम्रता का आपा खो गया, पतिव्रता पत्नी से उसने तुरंत ही चंडी का रूप धारण कर लिया /काफी कहा सुनी के बाद शाम को सब कार्य ख़त्म होने पर जब श्रीजन ने उन्हें बताया कि उन्होंने पी नहीं थी वो तो सिर्फ दोस्तों के लिए उन्होंने अपने पे ही मदिरा उड़ेल दी थी ताकि कोई उन पर शक न करे ,ये सुन कर नम्रता का सारा गुस्सा पानी कि तरह बह गया और अपने पर ग्लानी महसूस होने लगी , पर उसी समय बात कि नजाकत को समझते हुए श्रीजन ने नम्रता को समझाया कि तुमने जो किया था उचित किया ,यदि मैंने ऐसा कृत्या ही किया था तो मैं उसके दंड का भागिदार भी था /इस बात का नम्रता पर बहुत असर पड़ा और तब उन्होंने सहजता महसूस की और उन्हें एक अनोखी समझ का एहसास हुआ/
भगत जी की पहलवानी
करन भगत यूँ तो हमेशा से ही काफी संयम वाले व्यक्ति रहे हैं परन्तु किसी के ऊपर ज्यादती उनसे कत्तई बर्दाश्त नहीं होती थी,और न चाहते हुए भी भी वो दूसरों के पचड़ों में पड़ जाते थे और जाब बात अपने पर ही हो तब तो उनका अलग दैवीय रूप देखने को मिलता था / पर मजेदार बात यह थी कि वो कोई दारा सिंह नहीं थे इसके विपरीत बहुत ही दुबले थे हालाँकि ऐसा नहीं है कि इसके बाबत उन्होंने कोई प्रयास न किया हो पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात ही रहा है/ बल्कि लोग तो कहते थे कि एक समय वो अखारों में जाया करते थे और वहां पर व्यायाम शाला में अनगिनत दंड बैठक लगते थे कुछ लोग तो उन पर हँसते भी तठे पर इसकी उन्हें कोई परवाह न थी/ एक बार ऐसे ही वो बजरंग अखारे के व्यायामशाला में दंड बैठक में मशगूल थे, उसी वक्त गावं के मुखिया जी का बेटा हीरल नारंगी अया पहुंचा/ उसे गावं का सबसे बड़ा बदमाश कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और दूसरों कि टांग खीचना उसका बचपन से ही शगल रहा था / भगत जी को व्यायामशाला में कसरत करते देख उससे रहा नहीं गया और उन्हें देखते ही ठहाका मार दिया/ यूँ तो वह भी कोई पहेलवान नहीं था पर १७ साल कि उम्र में भी वह काफी बड़ा दिखता था और शरीर भी औसत था/ भगत जी का कोई अपमान कर दे ये तो उनसे बिलकुल भी नहीं सहा जाने वाला काम था और दोनों के बीच गहमा गहमी शुरू हो गई /आसपास के पहेलवान और आम आदमी जब वहां पर पहुंचे तब बात कुछ हल्काई /जब लोगों को इस झगडे कि जड़ का पता चला तो कानाफूसी शुरू हो गई/ इसी बीच भगत जी ने ऊँची आवाज में एलान करते हुए कहा "अगर इसको अपने पर इतना गुमान है तो मैं इससे दो दो हाथ करने को तैयार हूँ अगर मैं हारा तो तो कभी इस अखारे में नहीं आऊंगा पर अगर मैं जीत गया तो ये छः महीने तक मेरे खाने पीने का खर्च उठाएगा और मेरी सेवा करेगा"/ हालाँकि भगत जी ने इतनी अजीब शर्त रखी थी और उनका पलड़ा भरी भी था पर फिर भी तैश में आकर नारंगी ने कुश्ती के लिए हाँ कह दिया /गावं वालों ने दोनों को बहुत समझाया पर कोई भी कुछ सुनने को तैयार नहीं था अंततः कुश्ती का दिन अगले मंगल को नत्थी किया गया/कुश्ती में दो दिन और शेष थे और भगत जी जोर शोर से तैयारी कर रहे थे वहीँ जब मुखिया को इस बात का पता चला तो वो सोच में पड़ गए बात यूँ थी भगत जी मुखिया जी के बचपन से ही साथ में रहे हैं और वो उनके काफी करीब भी थे और हालाँकि शरीर भले ही भगत जी का कम हो, पर उन्हें लगता था भगत जी तो अखारे पर तो वो जाते ही थे और उन्हें दावँ पेंच तो आते ही होंगे वही नारंगी इसके उलट अगर नारंगी हार गया तो उनकी बहुत फजीहत होगी ये सोच के उनकी चिंता दुगुनी हो गयी और उसके बाद छः महीने कि आवाभगत वाली शर्त ने उनका चैन उड़ा दिया tha/
कुश्ती के एक दिन पहले कि रात में वो भगत जी से मिलने के लिए गए और कहा कि वो अपनी शर्त वापस लेलें पर अब भगत जी कहाँ सुनने वाले थे अंततः वो इस बात पर राजी हुए कि ५००० रूपये नगद और नारंगी खुद आके उनसे माफ़ी मांगे तब वो शर्त वापस ले लेंगे /मुखिया जी को इससे वाजिब कुछ और न लगा ५००० नगदी उन्होंने तुरंत भगत जी को दे दी और नारंगी को डांट डपट कर माफ़ी मांगने को कहा और इस तरह भगत जी कुश्ती लड़े बिना ही जीत गए /ये बात गावं में आग कि तरह फ़ैल गयी सब नारंगी को डरपोक तो कोई मुखिया को ही डरपोक बता रहा था कुछ तो भगत जी के लिए फूल माला का इंतज़ाम में लग गए /अगली सुबह जब भगत जी व्यायाम शाला पहुंचे तो लोगों ने उनका फूलों से सवागत किया और पहलवानों ने उनकी तारीफ़ओं के पुल बांध दिए , इतना मान सम्मान पाकर भगत जी का सीना ख़ुशी से फूले नहीं समां रहा था और उनका इकाह्रह बदन आज पहेले से भी जयादा तेजमान था/
कुश्ती के एक दिन पहले कि रात में वो भगत जी से मिलने के लिए गए और कहा कि वो अपनी शर्त वापस लेलें पर अब भगत जी कहाँ सुनने वाले थे अंततः वो इस बात पर राजी हुए कि ५००० रूपये नगद और नारंगी खुद आके उनसे माफ़ी मांगे तब वो शर्त वापस ले लेंगे /मुखिया जी को इससे वाजिब कुछ और न लगा ५००० नगदी उन्होंने तुरंत भगत जी को दे दी और नारंगी को डांट डपट कर माफ़ी मांगने को कहा और इस तरह भगत जी कुश्ती लड़े बिना ही जीत गए /ये बात गावं में आग कि तरह फ़ैल गयी सब नारंगी को डरपोक तो कोई मुखिया को ही डरपोक बता रहा था कुछ तो भगत जी के लिए फूल माला का इंतज़ाम में लग गए /अगली सुबह जब भगत जी व्यायाम शाला पहुंचे तो लोगों ने उनका फूलों से सवागत किया और पहलवानों ने उनकी तारीफ़ओं के पुल बांध दिए , इतना मान सम्मान पाकर भगत जी का सीना ख़ुशी से फूले नहीं समां रहा था और उनका इकाह्रह बदन आज पहेले से भी जयादा तेजमान था/
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