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Monday, October 31, 2011

आशा

हर वक़्त गहरा, हर शाम गहरी,
गहरा हुआ हर शमां,
हर समय मैं ढूंढता हूँ मेरी मंजिल है कहाँ/

कब मिलेगी जिंदगी वह,
जिसके धुंदु मैं निशाँ,
रात की अन्धक पवन में,
ज्ञान की निर्मल फिजा/

पर मेरी आशा बची है,
हार भी न मानी मैंने,
है यकीं मुझको अभी भी,
मिलेगा वह आसमाँ /


- सौरभ गुप्ता फैज़ाबादी 'आज़ाद'
संपूर्ण रचित सन २००४ में /


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