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Monday, November 19, 2012

Ayodhya

 Photos taken by SAURABH GUPTA
Ayodhya About this sound pronunciation (Sanskrit: अयोध्या, Urdu: ایودھیا‎, IAST Ayodhyā), also known as Saket (Sanskrit: साकेत, Urdu: ساکیت ‎) is an ancient city of India adjacent to Faizabad city in Faizabad district of Uttar Pradesh. As a result of rapid settlement and development Ayodhya has been merged to Faizabad city. Ayodhya is the birthplace of the Hindu deity Rama. It used to be the capital of the ancient Kosala Kingdom. This Hindu holy city is described as early as in the Hindu Epics. Ayodhya has an average elevation of 93 metres (305 feet).

Background

Ayodhya is located on the right bank of the river Saryu, as it is called within sacred precincts. Just 6 km from Faizabad, Ayodhya is a popular pilgrim centre. This town is closely associated with Lord Rama, the seventh incarnation of Lord Vishnu. The ancient city of Ayodhya, according to the Ramayana, was founded by Manu, the law-giver of the Hindus. For centuries, it was the capital of the descendants of the Surya dynasty of which Lord Rama was the most celebrated king. Ayodhya during ancient times was the capital of the Rama Empire and known as Kaushaldesa.


 Photos taken by SAURABH GUPTA
Skanda and some other Puranas mention Ayodhya as one of the seven most sacred cities of India. It was the venue of many events in Hindu mythology. Today pre-eminently a temple town, Ayodhya is famous for its close association with the epic Ramayana. It is a city of immense antiquity full of historical significance and sacred temples. The Atharvaveda described Ayodhya as "a city built by Gods and being prosperous as paradise itself."
The first ruling dynasty of this region were the Ikshvakus of the solar clan (Suryavansa). According to tradition, Ikshvaku was the eldest son of Vaivasvata Manu, who established himself at Ayodhya. The word for earth `Prithivi’ found in many Indian languages is supposed to have been derived from Prithu, the sixth king of the line. A few generations later came Mandhatri, in whose line the 31st king was Harischandra, known widely for his truthfulness(Sathya-sandhata) which he accepted as his life-style. He is also famous for his other good acts as king which were followed by the other kings of the Surya Vamsa also. Raja Sagar of the same clan performed the Asvamedha Yajna and his great grandson Bhagiratha is reputed to have brought the river Ganges on to the earth by virtue of his penance. Later in the time came the great Raghu, after whom the family came to be called as Raghuvamsa. His grandson was Raja Dasaratha, the father of Rama with whom the glory of the Kausala dynasty reached its highest point. The story of this epic has been immortalised by Valmiki in the Ramayana.
Ayodhya is a city of many places of worship. Several religions have grown and prospered simultaneously and at different periods. Remnants of Hinduism, Buddhism, Jainism and Islam can still be found in Ayodhya. According to Jainism, five Tirthankaras were born at Ayodhya, including Adinath (first Tirthankar),[1] Ajitnath (second Tirthankar),[2] Abhinandanath (fourth Tirthankar),[3] Sumatinath (fifth Tirthankar)[4] and Anantnath (fourteenth Tirthankar).[5] According to Jain Agams, it is the 2nd eternal city after Shikharji, which never vanishes or disappears during change of eras.

Thursday, July 19, 2012

तुम जो देखो तो एक सिरहन सी सीने तक जाती है ,
एक मीठा अहसास मेरे दिल में कराती है,
वो धीरे धीरे कहे गए शब्द जो हलके से मुझे छूते  हैं,

Tuesday, November 15, 2011

समझ

नम्रता बिनोवा एक सहनशील महिला थीं /बचपन से ही माँ के कामो में हाथ बटाती थी /भाइयों और बहनों की जितनी सेवा माँ ने की होगी उतना ही नम्रता ने भी कि थी यदि कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा/एक बार तो माँ बचपन में बीमार पड़ गयी उस समय सारे घर का बोझ नम्रता के सर अया गया /पर नम्रता ने उसे बहुत ही सहजता से उस कठिन समय में माँ और अपने भाई बहनों का ख्याल रख्खा /उनकी खुशियों कि खातिर उसने अपना बचपन बलिदान कर दिया /बहुत कम उम्र में उनका ब्याह श्रीजन महात्मा से हो गया वो भी घर के अग्रज थे और घर कि आर्थिक जिम्मेदारियों का वहन उन पर ही था/हालाँकि नम्रता को यूँ तो किसी ने गुस्सा होते नहीं देखा था और तो और यदि कोई उन पर गुस्सा होता तो वो चुपचाप सुन लेती थीं /उनके दर्द केवल अश्रुओं के माध्यम से तर सागर में मिल जाते थे और बाकि का गुस्सा वो अपने ईश देव को याद करके भूला देती थीं/फागुन का परवान चढ़ा हुआ था और इसके खुमार में गावं भर में एक अलग ही उल्लास दिखाई देता था /नम्रता आज भी अपनी पहली होली याद करती हैं तो उनकी शरीर में इक सिरहन सी दौड़ जाती है /शायद वोहि एक ऐसा दिन था जब उन्होंने पहली बार अपने पतिदेव पर kabhi गुस्सा निकाला था /श्रीजन यूँ तो बहुत भोले थे और किसी कि बात को ना कहने में अक्षम महसूस करते थे /होली के समय, शादी के पहले मदिरा पान पर कई बार उन्होंने आपत्ति जताई थी पर उनके मित्र उन्हें कहाँ छोड़ने वाले थे और शादी कि पहली होली पर वो कोई झंझट नहीं छाहते थे इसलिए इस बाआर उन्होंने थोडा रुक कर होली मानाने कि सोची/ पर कमबख्त मित्र गन मंडली सहित सुबह ही उनके घर आ पहुंचे और उन्हें अपने साथ उठा लिया/दोपहर बाद जब वो घर लौटे तो उनके रंगे पुते बदन par फटे कपड़ों में उनसे दूर से ही मदिरा कि बू आ रही थी / एक तो सुबह से उनकी नम्रता से बात भी नहीं हो पाई थी ,नम्रता ने जब दूर से ही उन्हें देखा तो पहले कुछ खुश हुईं पर वो ख़ुशी क्षद भंगुर मात्र थी/मदिरा कि महक से नम्रता का आपा खो गया, पतिव्रता पत्नी से उसने तुरंत ही चंडी का रूप धारण कर लिया /काफी कहा सुनी के बाद शाम को सब कार्य ख़त्म होने पर जब श्रीजन ने उन्हें बताया कि उन्होंने पी नहीं थी वो तो सिर्फ दोस्तों के लिए उन्होंने अपने पे ही मदिरा उड़ेल दी थी ताकि कोई उन पर शक न करे ,ये सुन कर नम्रता का सारा गुस्सा पानी कि तरह बह गया और अपने पर ग्लानी महसूस होने लगी , पर उसी समय बात कि नजाकत को समझते हुए श्रीजन ने नम्रता को समझाया कि तुमने जो किया था उचित किया ,यदि मैंने ऐसा कृत्या ही किया था तो मैं उसके दंड का भागिदार भी था /इस बात का नम्रता पर बहुत असर पड़ा और तब उन्होंने सहजता महसूस की और उन्हें एक अनोखी समझ का एहसास हुआ/

भगत जी की पहलवानी

करन भगत यूँ तो हमेशा से ही काफी संयम वाले व्यक्ति रहे हैं परन्तु किसी के ऊपर ज्यादती उनसे कत्तई बर्दाश्त नहीं होती थी,और न चाहते हुए भी भी वो दूसरों के पचड़ों में पड़ जाते थे और जाब बात अपने पर ही हो तब तो उनका अलग दैवीय रूप देखने को मिलता था / पर मजेदार बात यह थी कि वो कोई दारा सिंह नहीं थे इसके विपरीत बहुत ही दुबले थे हालाँकि ऐसा नहीं है कि इसके बाबत उन्होंने कोई प्रयास न किया हो पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात ही रहा है/ बल्कि लोग तो कहते थे कि एक समय वो अखारों में जाया करते थे और वहां पर व्यायाम शाला में अनगिनत दंड बैठक लगते थे कुछ लोग तो उन पर हँसते भी तठे पर इसकी उन्हें कोई परवाह न थी/ एक बार ऐसे ही वो बजरंग अखारे के व्यायामशाला में दंड बैठक में मशगूल थे, उसी वक्त गावं के मुखिया जी का बेटा हीरल नारंगी अया पहुंचा/ उसे गावं का सबसे बड़ा बदमाश कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और दूसरों कि टांग खीचना उसका बचपन से ही शगल रहा था / भगत जी को व्यायामशाला में कसरत करते देख उससे रहा नहीं गया और उन्हें देखते ही ठहाका मार दिया/ यूँ तो वह भी कोई पहेलवान नहीं था पर १७ साल कि उम्र में भी वह काफी बड़ा दिखता था और शरीर भी औसत था/ भगत जी का कोई अपमान कर दे ये तो उनसे बिलकुल भी नहीं सहा जाने वाला काम था और दोनों के बीच गहमा गहमी शुरू हो गई /आसपास के पहेलवान और आम आदमी जब वहां पर पहुंचे तब बात कुछ हल्काई /जब लोगों को इस झगडे कि जड़ का पता चला तो कानाफूसी शुरू हो गई/ इसी बीच भगत जी ने ऊँची आवाज में एलान करते हुए कहा "अगर इसको अपने पर इतना गुमान है तो मैं इससे दो दो हाथ करने को तैयार हूँ अगर मैं हारा तो तो कभी इस अखारे में नहीं आऊंगा पर अगर मैं जीत गया तो ये छः महीने तक मेरे खाने पीने का खर्च उठाएगा और मेरी सेवा करेगा"/ हालाँकि भगत जी ने इतनी अजीब शर्त रखी थी और उनका पलड़ा भरी भी था पर फिर भी तैश में आकर नारंगी ने कुश्ती के लिए हाँ कह दिया /गावं वालों ने दोनों को बहुत समझाया पर कोई भी कुछ सुनने को तैयार नहीं था अंततः कुश्ती का दिन अगले मंगल को नत्थी किया गया/कुश्ती में दो दिन और शेष थे और भगत जी जोर शोर से तैयारी कर रहे थे वहीँ जब मुखिया को इस बात का पता चला तो वो सोच में पड़ गए बात यूँ थी भगत जी मुखिया जी के बचपन से ही साथ में रहे हैं और वो उनके काफी करीब भी थे और हालाँकि शरीर भले ही भगत जी का कम हो, पर उन्हें लगता था भगत जी तो अखारे पर तो वो जाते ही थे और उन्हें दावँ पेंच तो आते ही होंगे वही नारंगी इसके उलट अगर नारंगी हार गया तो उनकी बहुत फजीहत होगी ये सोच के उनकी चिंता दुगुनी हो गयी और उसके बाद छः महीने कि आवाभगत वाली शर्त ने उनका चैन उड़ा दिया tha/
कुश्ती के एक दिन पहले कि रात में वो भगत जी से मिलने के लिए गए और कहा कि वो अपनी शर्त वापस लेलें पर अब भगत जी कहाँ सुनने वाले थे अंततः वो इस बात पर राजी हुए कि ५००० रूपये नगद और नारंगी खुद आके उनसे माफ़ी मांगे तब वो शर्त वापस ले लेंगे /मुखिया जी को इससे वाजिब कुछ और न लगा ५००० नगदी उन्होंने तुरंत भगत जी को दे दी और नारंगी को डांट डपट कर माफ़ी मांगने को कहा और इस तरह भगत जी कुश्ती लड़े बिना ही जीत गए /ये बात गावं में आग कि तरह फ़ैल गयी सब नारंगी को डरपोक तो कोई मुखिया को ही डरपोक बता रहा था कुछ तो भगत जी के लिए फूल माला का इंतज़ाम में लग गए /अगली सुबह जब भगत जी व्यायाम शाला पहुंचे तो लोगों ने उनका फूलों से सवागत किया और पहलवानों ने उनकी तारीफ़ओं के पुल बांध दिए , इतना मान सम्मान पाकर भगत जी का सीना ख़ुशी से फूले नहीं समां रहा था और उनका इकाह्रह बदन आज पहेले से भी जयादा तेजमान था/

Monday, October 31, 2011

आशा

हर वक़्त गहरा, हर शाम गहरी,
गहरा हुआ हर शमां,
हर समय मैं ढूंढता हूँ मेरी मंजिल है कहाँ/

कब मिलेगी जिंदगी वह,
जिसके धुंदु मैं निशाँ,
रात की अन्धक पवन में,
ज्ञान की निर्मल फिजा/

पर मेरी आशा बची है,
हार भी न मानी मैंने,
है यकीं मुझको अभी भी,
मिलेगा वह आसमाँ /


- सौरभ गुप्ता फैज़ाबादी 'आज़ाद'
संपूर्ण रचित सन २००४ में /


संकल्प

जगा वह जोश मन  में,
जो चाहिए एक जीत के लिए,
उठा वह वज्र हंसकर,
जो चाहिए एक युद्ध के लिए,
हिला दे पैरों तले धरती दुश्मनों की,
जिससे गिरें दुश्मन,
गगन के सामने उठकर दिखा ऊँचा,
एक विजय के लिए,
तू चल निर्विकार,
टेढ़े रास्तों पर,
क्योंकि तुझे है बढ़ना,
देश के लिए,
रख मन को एकाकार 'आज़ाद',
न हो चिंतित,
मिलेगी सफलता तुझे भी,
हर एक श्रम के लिए /


-  सौरभ गुप्ता फैज़ाबादी 'आज़ाद'
  संपूर्ण रचित सन २००४

Monday, February 7, 2011

Ahsaas


hai shakoon aaj sine mein,
ek narm ,garm ,halka sa ahsaas,
kuch khas,
kabhi duur ,kabhi paas,
khwabon ka shahar ,
jaise tanha samundar,
ke kinaron par bheege pairon
par bahati hawa ki chhuwan,
jaise koi
keh de
kaano mein
halke se,
pyar se ,
naaj se,
kuch meethe shabd!!